अंधेरों में रोशनी सी बेटी"

         "अंधेरों में रोशनी सी बेटी"


चक्रवात तूफान की चेतावनी चारों तरफ दी जा रही थी, तूफान ,बारिश की वजह से दूर-दूर तक सड़क पर कोई नहीं था ।वहीं सड़क के किनारे, कचरे के बड़े ढेर के पास, एक छोटी सी झोपड़ी में ,लाली अपने 9 महीने के पूरे पेट के साथ कराह रही थी। दर्द पर दर्द चले जा रहे थे ,धरती से अंकुर फूटने ही वाला था ,पर 3 दिन से लाली ने एक अन्न का दाना भी नहीं खाया था। उसके पास अब दर्द के चक्र से बाहर निकलने की भी हिम्मत नहीं थी। समय बहुत कम था ,लाली थक कर चूर हो चुकी थी ,पर उस अंकुर ने हार नहीं मानी।

उस अंधेरे में रोशनी सी ,कड़कड़ाती हुई बिजली की तरह बाहर आ गई……. एक नन्ही सी बेटी।...

       लाल सिंदूर में लिपटी ,बिजली सा तेज ,सूरज की रोशनी सी चमचमाती नन्ही सी कली को, अपने हाथों में देखकर सब दुख- दर्द भूल गई लाली । अपनी यथास्थिति को लाली समझ रही थी ,अब ज्यादा समय नहीं था ।कहीं इस तूफान में यह नन्ही कली झोपड़ी में ही ना दब जाए ,यह सोचकर उसने अपनी सुर्ख लाल चुनरी में लपेटकर ,उसे कागज के डब्बे मैं डाला और अपने पूरे दम के साथ , उसे बाहर धक्का देते -देते, खुद -उस देह से आजाद हो चली।

मानो , बस इसी का इंतजार था ,झोपड़ी भी तूफान में ढह  गई । तेजी से चलती हुई कार ने, अचानक से ब्रेक लगाए। सड़क पर पेड़ की टहनी गिरी हुई थी ,ड्राइवर उसे उठाने बाहर निकला ,तो नन्ही सी कली चीख पड़ी ।कागज के डिब्बे में से रोने की आवाज सुनकर  ड्राइवर घबरा गया ।देर होते देख मालकिन वृंदा ,गाड़ी से निकली , तभी उस नन्ही सी कली ने उसे अपनी आवाज से खींच लिया । सुर्ख लाल कपड़े में बंधी नन्ही सी कली इतने अंधेरे में भी चमक रही थी, वृंदा उसे लेकर अस्पताल की तरफ दौड़ी।
अस्पताल में पहुंचते ही नर्स ने कहा-बधाई हो माँ जी ,आपके घर लक्ष्मी आई है ,आपकी बहू को अभी होश नहीं आया जल्दी चलिए।
वृंदा ने कहा -एक नहीं दो-दो लक्ष्मी आई है। इसे संभालो, आज तो मैं डबल बधाई दूंगी । कहते- कहते अपनी बहू के पास गई, और उसका माथा चूम लिया। स्नेह भरा स्पर्श मिलते ही, बहू नैना ने आंखें खोली ,जैसे -मानो ,वर्षों की वृंदा की ख्वाहिश पूरी कर ,आज वह बहुत गर्व महसूस कर रही थी ।
तीन पोते होने के बाद भी, वृंदा की ख़्वाहिश थी ,कि एक पोती चाहिए। कई पीढ़ियों से यह घर एक नन्ही सी बिटिया के लिए तरस रहा था।
नर्स की शिफ्ट बदल चुकी थी, दूसरी नर्स दौड़ी- दौड़ी आई उसने कहा- मां जी आप जल्दी आइए।
नैना बोली-मां गुड़िया को तो दिखाओ .....
बस ,बेटा अभी लाई ... वृंदा कहते हुए नर्स के साथ गई।
देखा, दोनों बेटियां एक जैसे कपड़ों में बहुत सुंदर दिख रही थी ।पर यह क्या -एक रो रही थी, और एक बिल्कुल शांत ।
माँ जी आप की इस पोती को इंफेक्शन हो गया , अब यह नहीं रही। 
वृंदा को समझते हुए देर ना लगी, ईश्वर के उस वरदान के लिए धन्यवाद करें ,या जो नहीं रही ,उसका मातम करे।
कड़वे घूंट पीकर वृंदा जोर से बोली- यही तो है मेरी पोती, जो जी गई ,जो नहीं है ,उसका  अफसोस तो जिंदगी भर रहेगा।
नन्ही सी कली को अपनी गोद में लेकर आंसुओं के घूंट पीकर,चेहरे पर मुस्कान लिए हुए चल पड़ी वृदां अपनी बहू नैना के पास।
पूरा परिवार अपनी उस नन्ही सी कली को देखने के लिए बेताब था। तभी, सबसे छोटे भाई ने बोला -"मेरी बहन का नाम तो वीरा ही होगा, इतनी खूबसूरत ,इतनी प्यारी सी गुड़िया, मैंने आज तक नहीं देखी ,चलो मम्मी -अब जल्दी चलो वीरा को लेकर घर चलते हैं।"
वीरा राजकुमारी सी ,सबकी लाडली थी। नन्ही सी कली अब फूल में बदल रही थी, सभी कलाओं में निपुण, खुशमिजाज, बुद्धिमान और अपनी मुस्कुराहट से सबके दिल को भा जाती थी। रोज गाड़ी से स्कूल आते -जाते रास्ते के किनारे पर बनी झुग्गी झोपड़ी से उसका लगाव, किसी से भी नहीं छुपता था ।कभी-कभी तो उन बच्चों को अपना टिफिन दे आती ,कभी पेंसिल ,रबड़ ,कॉपी ,किताब ,बस्ता कुछ भी जो  उसे अपना लगता सब दे आती। नैना ,बहुत गुस्सा करती ,उसे बहुत डांटती, पर वीरा की आदत बिल्कुल नहीं छूटती।वृंदा ,वीरा का पक्ष लेकर नैना को समझाती रहती।
यह लगाव वृंदा को डराता भी था ,और उसकी करुणा के प्रति उसके लिए सम्मान भी महसूस करवाता था। 
पर ,एक दिन तो हद ही हो गई थी ,स्कूल से आते समय वीरा ने एक छोटे से बच्चे को देखा ,जिसके हाथों पर चोट लगी थी ,और खून बह रहा था। वीरा ने तनिक भी देर नहीं की, और उसे अपने साथ गाड़ी में बिठा कर घर ले आई। वृंदा ,और नैना उसके कपड़ों पर लगे खून को देखकर डर गए, फिर उस बच्चे के हाथों पर पट्टी की और उसे घर छोड़कर आए।

इस घटना से जहां नैना बहुत परेशान थी, वहीं वृंदा को महसूस हो गया था, कि अब कोई ना कोई रास्ता निकालना ही पड़ेगा। उसने वीरा को बुलाया और समझाया -"वीरा अगर आप सभी की मदद करना चाहते हो ,तो आपको डॉक्टर बनना पड़ेगा। पहले खुद को इस लायक बनाना होगा, कि आप दूसरों के काम आ सको।'' वीरा अभी दसवीं में थी ।
इस बात ने वीरा की जिंदगी को एक लक्ष्य बता दिया था ।  दिन -रात एक कर अपनी पढ़ाई में जुट गई । समय बीतते देर नहीं लगी, और वीरा ने मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले लिया। जमकर पढ़ाई की और अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होकर, अपने मां बाबा का नाम रोशन किया।
      आज ,डॉक्टर वीरा घर आने वाली थी, सभी को उसका बेसब्री से इंतजार था और वीरा को इंतजार था, अपनी दादी से मिलने का। क्योंकि आज दादी का 60 वा जन्मदिन था ,घर चारों तरफ से सजा हुआ था, ख़ुशियाँ ही खुशियां थी।
वृंदा का जन्मदिन सभी ने धूमधाम से मनाया । दिन भर की थकान से वृंदा और वीरा थक चुके थे।दोनों दादी -पोती कमरे बैठकर आपस में बातें कर रही थी। वीरा-"दादी आप मेरे लिए बिल्कुल फरिश्ते की जैसी हो, जिसने हर कदम पर मुझे रास्ता दिखाया और हर जगह मेरे साथ खड़ी रही।आज सिर्फ आपकी वजह से ही मैं एक डॉक्टर बनी, आपने मेरे जीवन को एक बहुत बड़ा लक्ष्य दे दिया ,आप नहीं जानती कि आप मेरे लिए क्या हो??"
दोनों ओर से ज़ज़्बात बह रहे थे, वृंदा ने अपनी सारी सीमाएं ,सारी दीवारों ,को लांघ कर कहा -"रुक ,मैं आज तुझे एक और चीज बताना चाहती हूं... यह खत जो तेरी अमानत है।"
खत में लिखा था ....'' मेरे बच्चे पता नहीं मैं रहूं ,या ना रहूं पर तू ,डॉक्टर जरूर बनना, जैसे मैं तड़प के रह गई ,कोई और मेरी तरह ना तड़पे,  तू सबके अंधेरों में रोशनी भरना।"

वीरा को कुछ भी नहीं समझ आया, चारों तरफ अंधेरा सा छा गया था ।वीरा के अंधेरे में वृंदा ने रोशनी डाली और उसे बताया कि जिस चुनरी में वह लिपटी हुई थी, उस चुनरी के कोने में यह खत बंधा था, जो उसकी अमानत था ।जिसे आज तक वृंदा ने संभाल कर रखा था।
आज वीरा की नजर में वृंदा उसकी भगवान थी,
वृंदा ने उससे एक कसम ली कि-" यह बात तेरे और मेरे अलावा किसी को भी नहीं पता चलनी चाहिए।"
यह तो एक छोटी सी बात थी ,वीरा  तो अपने भगवान के लिए तो कुछ भी कर सकती थी। वीरा ने उन झुग्गी- झोपड़ी में जाकर अपना क्लीनिक खोला और सभी जरूरतमंदों का निःशुल्क इलाज करने लगी।
सैकड़ों घरों के अंधेरों को दूर करने वाली रोशनी बन चुकी थी ।"वीरा"
                            रश्मि दाधीच।

                         
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