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मार्च, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Proud to be a housemaker

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          नारी                  मैं   जननी जन- जन में बसती ,    आधार सृष्टि सबकी शक्ति ,         वात्सल्य, प्रेम की मूरत हूँ , हर  घर में ज्योत मेरी जगती।                            भारतीय समाज में नारी की जगह वही होती है जो मानव शरीर में आत्मा की होती है ,जो सम्पूर्ण कार्य के संचालन का केंद्र होती है।  नारी - जो मकान को घर बनाती है ,घर में परिवार बसाती है ,परिवार में रिश्ते- नातों के फूल लगाती है ,इन्ही रिश्तो की अनूठी परम्परओं को ,हमारे संस्कारों को ,संस्कृति को, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाती है। घर परिवार की छोटी- बड़ी सभी जिम्मेदारियों को निभाते हुए, अपने घर में ऐसा वातावरण तैयार करती ताकि सभी सदस्य अपने सपनों को सच कर सके। परिवार में निरन्तर आशा की लौ जलाती है ,प्रेरित करती है की उन्हें मंजिल मिले  और वे समाज में गर्व के साथ अपना योगदान कर सके।  इ...

Bachpan par Bojh

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जी जान लगा दी मैंने माँ ,मैं थक कर हो गयी चूर,  फिर भी नम्बर पूरे नहीं है , क्या है मेरा कसूर ???? बच्चों के एग्जॉम तो पूरे हो गए पर अभी भी एक तलवार सर पर लटक रही है ,रिजल्ट की।  ये एग्जाम का, रिजल्ट का, अच्छे नम्बर लाने  का ,और क्लास में रैंक का ,कभी सोचा है, ये प्रेशर बच्चों के छोटे से मन पर कितना गहरा प्रभाव डालता है। आखिर बच्चों को इस बोझ के तले कौन दबाता है ????? गौर से देखना, अपने आस- पास कहीं आप भी अपने बच्चों के नम्बर को उनकी आन ,बान ,शान  से तो नहीं जोड़ रहे?????? मेरी बेटी दिव्या की सहेली रितु  घर पर आयी, उसके साथ खेलने के लिए। यही पड़ोस में ही रहती है, उसकी मम्मी और मैं भी इन दोनों की वजह से अच्छे दोस्त है। वो दोनों खेल रही थी।  माँ वहीं अपने टेब पर बुक पढ़ रही थी ,और मैं सभी के लिए पकोड़े बना रही थी। वो दोनों खेलते- खेलते आपस में बातें करने लगी। रितु -     अरे यार , कल तो  रिजल्ट आने वाला है ,तुझे टेंशन नहीं है? दिव्या -  नहीं, इतनी ज्यादा भी नहीं ,अगर नम्बर कम भी आये, तो मैं अगले साल ओर मेहनत करूँगी। ...

KISI KA PAHNAVA USKE VYKTITVA KI PAHCHAN NAHI HOTA

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                                  मिट्टी की खुशबू   माँ, मुम्बई से  मेरी सहेली दीप्ती  की बेटी आज यहाँ आ रही है। ये देखिये, व्हॉट्सअप पर उसकी फोटो आयी है। बनारस पर  फोटो शूट करने आ रही है दो- तीन दिन के लिए। माँ फोटो देखते हुए बोली -आजकल के बच्चे कितनी तेजी से मॉर्डन होते जा रहे है,और कपडे,छोटे होते जा रहे हैं। पहनावा ,बोल-चाल ,रहन-सहन सभी कुछ पाश्चात्य सभ्यता में ही रंगा हुआ है। मैं बोली- माँ हमारी संस्कृति तो प्रारम्भ से ही इतने खुले विचारों की है। हमने सभी बदलावों को सहर्ष स्वीकार किया है।  किसी के पहनावे से क्या फर्क पड़ता है यदि उसके विचारों में,संस्कारों में,उसके व्यवहार में ,हमारी संस्कृति की झलक हो ,हमारी मिट्टी की खुशबु हो। तभी डोर बेल बजी,, दरवाजा खोला, तो मेरे सामने थी ,एक खूबसूरत लड़की पैरों में बूट ,जीन्स,शॉर्ट शर्ट,गले में स्कार्फ़ ,साथ में गिटार और हाथों में कैमरा लेकर मेरी फोटो खींच रही थी। एक पल को तो मैं  समझ ही नहीं पायी, की ये ...