Bachpan par Bojh

जी जान लगा दी मैंने माँ ,मैं थक कर हो गयी चूर, 

फिर भी नम्बर पूरे नहीं है , क्या है मेरा कसूर ????

बच्चों के एग्जॉम तो पूरे हो गए पर अभी भी एक तलवार सर पर लटक रही है ,रिजल्ट की।  ये एग्जाम का, रिजल्ट का, अच्छे नम्बर लाने  का ,और क्लास में रैंक का ,कभी सोचा है, ये प्रेशर बच्चों के छोटे से मन पर कितना गहरा प्रभाव डालता है। आखिर बच्चों को इस बोझ के तले कौन दबाता है ?????
गौर से देखना, अपने आस- पास कहीं आप भी अपने बच्चों के नम्बर को उनकी आन ,बान ,शान  से तो नहीं जोड़ रहे??????
मेरी बेटी दिव्या की सहेली रितु  घर पर आयी, उसके साथ खेलने के लिए। यही पड़ोस में ही रहती है, उसकी मम्मी और मैं भी इन दोनों की वजह से अच्छे दोस्त है। वो दोनों खेल रही थी।  माँ वहीं अपने टेब पर बुक पढ़ रही थी ,और मैं सभी के लिए पकोड़े बना रही थी। वो दोनों खेलते- खेलते आपस में बातें करने लगी।
रितु -     अरे यार , कल तो  रिजल्ट आने वाला है ,तुझे टेंशन नहीं है?


दिव्या -  नहीं, इतनी ज्यादा भी नहीं ,अगर नम्बर कम भी आये, तो मैं अगले साल ओर मेहनत करूँगी।


रितु -     तू पागल है क्या  ? तेरी मम्मी तुझे  नहीं डाँटेगी ???और अगर तेरा क्लास में कोई रैंक नहीं बना             तो ??? तेरी क्या इमेज बनेगी ??  मेरी मॉम ने तो साफ़ साफ़ कहा है की पूरे नम्बर आने चाहिए, कम से कम रेणु से ज्यादा ,पिछली बार  भी उसका ही फर्स्ट रैंक था। इस बार भी अगर उसका फर्स्ट आया, तो मॉम तो मुझे कुछ भी गिफ्ट नहीं देंगी।डाँटेगी सो अलग ,मुझे तो रेणु पर बहुत गुस्सा आता है, वो इतना क्यों पढ़ती है???

दिव्या -मेरी दादी और मम्मी हमेशा एक बात कहती है की अपनी तुलना किसी से भी नहीं करनी चाहिए।           कोई जरूरी नहीं की सभी एक जैसे हो। मैं हमेशा खुद से ही प्रतियोगिता करती हूँ और इस बार             मुझे पता है की मैं अर्द्धवार्षिक परीक्षा से ज्यादा नम्बर लाऊंगी।

रितु -  मुझे तो रात को नींद भी नहीं आती रिजल्ट के बारे में सोच- सोच कर, सपने में भी मम्मी और पापा       दिखते है,वो भी गुस्से से लाल- पीले।मम्मी- पाप चाहते है, मैं हमेशा 99% स्कोर करू, पर मैं 95%पर    ही अटक जाती  हूँ..इस बार तो mathes  का पेपर भी बिगड़ गया था ,तो पता नहीं इतने भी बनेंगे या नहीं।
माँ,    मेरे पास आयीं, और मुझे पूरी बात सुनायी ,उन्होंने सब कुछ टैब मैं रिकॉर्ड कर लिया था।  एक मासूम का दिल उम्मीदों के बोझ तले  दबा जा रहा था।
मैने रितु की मम्मी, लता को फ़ोन करके कहा -लता ,रितु को चोट लगी है ,ज़रा घर आओगी।
लता तुरन्त घर पर आयी, और बोली -कहाँ  है रितु ?कैसी है ?
मैं उसे रितु के पास कमरे में ले गयी, और देखा, तो रितु, दिव्या के साथ आराम से खेल रही थी।  लता मेरी तरफ देख कर पूछने ही वाली थी  ?????
  मैं बोली -उसके दिल पर जो चोट लगी है, मैं उसकी बात कर रही थी।
    माँ ने उसे पूरा विडियो दिखाया। पास में टेबल पर रखी, एक प्लास्टिक की स्केल को लेकर माँ ने लता को दिया और कहा- लता इसे मोड़ना शुरू कर,पर ध्यान से, धीरे-धीरे कहीं टूट न जाये। लता कुछ भी समझ नहीं पा रही थी। वो स्केल को मोड़ने लगी, थोड़ा और ,थोड़ा और, करते-करते वो स्केल टूट गयी।
 लता ने माँ को बोला -लो अम्मा जी ये स्केल तो टूट गयी। अब इतना मोड़ेंगे तो कोई भी स्केल  टूट जाएगी।
माँ बोली -शुक्र कर, की ये स्केल थी तेरी बेटी नहीं ,अगर तेरा दबाव उस पर कम नहीं हुआ तो एक दिन वो भी अपनी हिम्मत हार जाएगी।
माना, माता- पिता अपने बच्चो के भविष्य के प्रति बहुत सजग होते हैं।  वे हर हाल में अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना चाहते है, और इसिलए बचपन से ही उस पर  पढ़ाई का,  दबाव बनाना शुरू कर देते है।    हमें हमारे बच्चों के बारे में पता होना चाहिए , की वो कितना दबाव सहन कर सकते है। ज्ञान कोई बोझ या दबाव नहीं है, ये तो बच्चों के बौद्धिक विकास का जरिया है। परन्तु जब माता- पिता इसे अपने स्वाभिमान से जोड़ लेते है, तो वो बच्चों पर एक अनचाहा बोझ बन जाता है।आज  सबसे ज्यादा जरूरी है, की बच्चे जो भी करे, वो किसी बोझ के तले दब  कर नहीं, अपितु अपनी ख़ुशी ओर अपनी इच्छा से करे।  अब लता समझ गयी और आप ??????????????




टिप्पणियाँ

  1. बहुत अच्छा विचार है। जब तक माता पिता अपने बच्चों की शैक्षणिक प्रगति को अपने स्वाभिमान से जोड़कर देखने की आदत नहीं बदलेंगे तब तक यह स्थिति नहीं बदलने वाली।

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