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हमारी रसोई...

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#Kitchen  … रसोई..  रसोई को, बस रसोई मत समझिए जनाब-  यहां रिश्तो के  नए-नए जायके बनते हैं, संवरते हैं,निखरते हैं,  पनपते हैं।  धीमी -धीमी आंच पर पकते पकवान, जब मुंह में जाकर पिघलते हैं,  दिल से दिल के तार जुड़ जाते हैं,जज्बात लफ्ज़ बनकर निकलते हैं।  इस रसोई में जनाब - रूठने मनाने के सिलसिले भी, चलते हैं।  यहां रिश्तो के………  घर के इस कोने में दावतें सजती है, इश्क- मोहब्बत  की,   ख्याल रखते है एक दूजे का, चर्चाएं होती है, आपकी- हमारी सेहत की।   जी हां, यह वही कौना है, जहां सूरमा पलते हैं…  इसी रसोई से ही जनाब- अम्मा के चंदा, सूरज, सितारे, सब     यहीं निकलते हैं।  यहां रिश्तो के नये…..  दादी नानी से नई पीढ़ी तक, सब का जादू यहां चलता है,   वक्त बीत जाता है, पर जायका  जीभ पर टहलता है,  यह रसोई हमारी जिंदगी है, जिसने सभी जायकों को चखा है,  तीखा, खट्टा, कड़वा, मीठा, हर स्वाद रसोई  ने समेट कर रखा है।  इस रसोई में पीढ़ियों...

रिटायरमेंट पार्टी"

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          " रिटायरमेंट पार्टी" आज रागिनी को, साँस लेने की भी फुर्सत नहीं है, क्योंकि शाम को,बहुत ही आलीशान पार्टी होने वाली है, उसके पति नीलेश के रिटायरमेंट की खुशी में। इतने दिनों की योजना बनाते-बनाते, आज वो दिन आ ही गया।जब ,पूरा परिवार इस खुशी में शामिल होने वाला है। दूर-दूर से रिश्तेदार आए हैं, बड़े-बड़े मेहमान भी आने वाले हैं। निलेश अपनी कंपनी  के सीईओ पद से सेवानिवृत्त हुए हैं । राहुल-हां मेरी मां बिल्कुल चिंता मत करो। मैं सब कुछ अपनी आंखों से देख कर आया हूं। सब काम एकदम टाइम पर हो रहा है, बस आप अच्छे से तैयार होकर टाइम पर वहां  पहुंच जाना। रागिनी -बहुत अच्छे बेटा मैं बस, अब पार्लर ही जा रही हूं ,सीधे वहीं पर ही पहुंच जाऊंगी ।पापा को टाइम से ले जाना,और हां, कविता और कृष्णा मेरे साथ ही वहां पहुंचेगीं। शाम  को पार्टी हॉल के बाहर जैसे ही रागिनी की गाड़ी आकर रुकी, गेट खोलते ही सामने निलेश खड़े थे, रागिनी की तरफ हाथ बढ़ाते हुए। रागिनी -आप क्या कर रहे हो? आपको तो अंदर , नीलेश बीच में -तुम्हारे बिना मैं अंदर क्या करूंगा, दोनों साथ चलेंग...

KUDARAT....

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"कुदरत" यह तस्वीर देखकर बताइए,  क्या लगता है आपको?  यह कहानी किसकी होगी ? क्या इस कुर्सी पर बैठे उस शख्स की जो अभी वहां नहीं है?  या उस कुर्सी पर रखी उस किताब की ? यह तो आपको कहानी पढ़ने के बाद ही पता चलेगा। उस दिन बारिश बहुत तेज हो रही थी ।मेरे सामने एक 14 साल का बच्चा उछलता, कूदता, उस बारिश के मजे ले रहा था। मैं बस-स्टैंड पर खड़ी उसको देख रही थी। सामने से, छोटा सा ठेला आ रहा था, जिस पर बहुत सारे पौधे रखे हुए थे। वह बच्चा उछलते -कूदते उस ठेले वाले माली से टकरा गया, क्योंकि  बारिश का टाइम था इसलिए ठेला धीरे -धीरे चल रहा था। उस बच्चे के टकराने की वजह से कुछ पौधे सड़क पर गिर गए ।ठेले वाले माली को बहुत गुस्सा आया।उसने उस बच्चे को दो-चार गालियां दी और जाकर अपने पौधे उठाना लगा। एक नन्हा सा पौधा एक कोने में गिर गया ,पौधे की थैली फट गई थी। उस बच्चे ने उस पौधे को अपने हथेली में बड़े प्यार से उठा लिया। अपनी हथेली में उठाकर, माली के पास लेकर आया और बोला-' काका इसको भी रख लो ।"माली ने उसे दो थप्पड़ जड़ दिये,जोर से गुस्से से ,अपने हाथ से धकेल दिया। मैं देख र...

AASHA KE DEEPAK

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''आशा के दीपक ''  "आशा के दीपक" तुम आशा के दीपक जलाए रखना,  अंधकार से दूरी बनाए रखना,  गर घेर ले अंधेरा फिर भी तुम्हें,  उस रात खुद को जगाए रखना, फिर रात कितनी भी काली हो , तुम टूटने बिखरने वाली हो , विश्वास भरी आंखों से देखना,  जहां भोर  बस होने ही वाली हो  इम्तिहानआयेंग...

#HindiDiwas "हिंदी दिवस"

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#HindiDiwas "हिंदी दिवस" बुझी -बुझी, कुछ उखड़ी -उखड़ी कल रस्ते में मिल गई हिंदी।  मैंने पूछा -अस्त -व्यस्त क्यों, कहां गई माथे की बिंदी ? "हिंदी" किसको है परवाह मेरी, क्यों झूठा प्यार दिखाते हो?  सभी मंच पर खड़े -खड़े तुमअंग्रेजी बतलाते हो। यही पे जन्मी , पली-बढ़ी मैं, पर मैंने क्या पाया है??  बच्चे हो या युवा सभी पर, अंग्रेजी का साया है । देसी भाषा, वर्ण विदेशी, यह एक नया दिखावा है।  अंग्रेजी से हिंदी लिखते, कैसा नया छलावा है?  मेरे बच्चे होकर तुम अब, मुझसे ही कतराते हो!  मुझ को जिंदा रखने खातिर, हिंदी दिवस मनाते हो।  मैं बोली- ऐसा भी नहीं मां, कुछ हम पर भी विश्वास करो।  पुनः लौट आएगा स्वर्णिम," हिंदी युग" यह-आस करो । भारत में अनेक भाषाएं, लेकिन तुम सर्वोत्तम हो । सुंदर लिपि है, सुंदर लेखन, आकर्षित अति उत्तम हो।  गूगल, व्हाट्सएप ,फेसबुक, टि्वटर,तुम पर इंस्टाग्राम है। यू एन में भी गूंज रहा अब तेरा गौरव का गान है। मातृ -भाषा तुम शर्म नहीं हो, भारत का अभिमान हो।  हिंद देश की हिं...

अंधेरों में रोशनी सी बेटी"

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          " अंधेरों में रोशनी सी बेटी" चक्रवात तूफान की चेतावनी चारों तरफ दी जा रही थी, तूफान ,बारिश की वजह से दूर-दूर तक सड़क पर कोई नहीं था ।वहीं सड़क के किनारे, कचरे के बड़े ढेर के पास, एक छोटी सी झोपड़ी में ,लाली अपने 9 महीने के पूरे पेट के साथ कराह रही थी। दर्द पर दर्द चले जा रहे थे ,धरती से अंकुर फूटने ही वाला था ,पर 3 दिन से लाली ने एक अन्न का दाना भी नहीं खाया था। उसके पास अब दर्द के चक्र से बाहर निकलने की भी हिम्मत नहीं थी। समय बहुत कम था ,लाली थक कर चूर हो चुकी थी ,पर उस अंकुर ने हार नहीं मानी। उस अंधेरे में रोशनी सी ,कड़कड़ाती हुई बिजली की तरह बाहर आ गई……. एक नन्ही सी बेटी।...         लाल सिंदूर में लिपटी ,बिजली सा तेज ,सूरज की रोशनी सी चमचमाती नन्ही सी कली को, अपने हाथों में देखकर सब दुख- दर्द भूल गई लाली । अपनी यथास्थिति को लाली समझ रही थी ,अब ज्यादा समय नहीं था ।कहीं इस तूफान में यह नन्ही कली झोपड़ी में ही ना दब जाए ,यह सोचकर उसने अपनी सुर्ख लाल चुनरी में लपेटकर ,उसे कागज के डब्बे मैं डाल...

उसकी मदद

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             फोन पर-  राहुल-हां माँ सब ठीक,  हां, हां मैंने पासपोर्ट रख लिया है,        हां आज रात की ही फ्लाइट है,       बस मैं एयरपोर्ट ही निकल रहा हूं ,      हां ,छुटकी का लैपटॉप भी रख लिया लेकिन ,आप यह बात उसे बताना मत, उसके लिए सरप्राइज है।  बस करो मां, अब रख दो कल तक पहुंच जाऊंगा आपके पास।   नहीं मां, सुबह तक नहीं रात तक ही   पहुंचूंगा।   मुझे लेट हो रहा है मैं रख रहा हूं फोन। जल्दी-जल्दी अपना सामान जमाते हुए, राहुल तैयारी कर रहा है इंडिया जाने की। 2 साल बाद उसे मौका मिल रहा है, घर पर दिवाली मनाने का और यूं देखो तो 8 साल बाद अपने घर वालों के साथ, सुकून से रहने जा रहा है 1 महीने के लिए। क्योंकि पहले के 6 साल तो पढ़ाई के चक्कर में ही, घर से बाहर निकल गये और इन 2 सालों  से, वो कनाडा में ही जॉब कर रहा है ।अचानक से कुछ याद आया। फोन पर- राहुल -अरे हां माँ, मै...