हमारी रसोई...

#Kitchen 
… रसोई.. 
रसोई को, बस रसोई मत समझिए जनाब-

 यहां रिश्तो के  नए-नए जायके बनते हैं, संवरते हैं,निखरते हैं,  पनपते हैं। 
धीमी -धीमी आंच पर पकते पकवान, जब मुंह में जाकर पिघलते हैं, 
दिल से दिल के तार जुड़ जाते हैं,जज्बात लफ्ज़ बनकर निकलते हैं। 
इस रसोई में जनाब - रूठने मनाने के सिलसिले भी, चलते हैं।
 यहां रिश्तो के……… 

घर के इस कोने में दावतें सजती है, इश्क- मोहब्बत  की, 
 ख्याल रखते है एक दूजे का, चर्चाएं होती है, आपकी- हमारी सेहत की। 
 जी हां, यह वही कौना है, जहां सूरमा पलते हैं… 
इसी रसोई से ही जनाब- अम्मा के चंदा, सूरज, सितारे, सब     यहीं निकलते हैं। 
यहां रिश्तो के नये….. 

दादी नानी से नई पीढ़ी तक, सब का जादू यहां चलता है, 
 वक्त बीत जाता है, पर जायका  जीभ पर टहलता है, 
यह रसोई हमारी जिंदगी है, जिसने सभी जायकों को चखा है, 
तीखा, खट्टा, कड़वा, मीठा, हर स्वाद रसोई  ने समेट कर रखा है। 
इस रसोई में पीढ़ियों की परंपराओं के, जायके आज भी पलते हैं 
यह वो जगह है जनाब - जहां सभी व्यंजन अपने - अपने किरदारों के साथ एक ही थाली में ढलते हैं। 
रसोई को बस रसोई मत समझिए जनाब…. 
यहां रिश्तो के जायके के बनते हैं………
                                    .. रश्मि… 

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