EK SABAK
कभी कभी जीवन का सबक सीखने के लिए एक छोटा सा पल भी काफी होता है। जीवन ,रेत की तरह हाथ से फिसलता चला जाता है, और हम बस अपने भविष्य की कल्पनाओं में ही जुटे रहते है। हमें आज,अभी ,और इसी पल में ही जीना सीखना चाहिये। घर की मुंडेर पर जमीं हुई, मैं सोच रही थी बैठी- बैठी , नीचे हा- हा कार मचा क्यों ,मैं अर्थी पर क्यों हूँ लेटी। नीचे जाकर खूब जगाया, खुद ने खुद को खूब उठाया। तभी पधारे यम अंकल जी, करने मुझसे भेंट , चलो वत्स ,अब बहुत हो गया ,यू आर गेटिंग लेट। मैं झल्लायी ,चिल्लाई बोली ये कैसा है इन्साफ ? वार्निंग तो देनी थी पहले ,कैसे कर दिया मुझको साफ़ ? अब तक मैंने किया ही क्या है ? जी भर के कुछ जिया ही क्या है ? अच्छे पल के इन्तजार में ,तकती रास्ता आँख बिछाये , मंजिल का तो पता नहीं, पर तुम क्यूँ बीच में लेने आये ? यम अंकल जी हंस कर बोले, रोज मैं सुनता यही कहानी , जीते जी तुम समझ ना पाए ,मर कर सब बनते हो ज्ञानी। सदियों से तुम पढ़ते आये लिखते ,रटते,जपते,आये, हर प...