khamosh lafj

इस कविता की सोच, मुझे एक वृद्धाश्रम से मिली। जहाँ मैंने एक बहुत ही बुजुर्ग महिला को देखा और उनसे पूछा -अम्माँ आप कौन है ?क्या नाम है आपका ?उनकी आँखों की चमक और होठों की मुस्कराहट देख कर लगा, जैसे वो उस सवाल का जवाब देने को बेताब थी, बहुत खुश होकर वो बोलने लगी  लेकिन ,लफ्ज़ हवा के साथ बाहर फिसल गए। .....शब्दों को  ध्वनि और आकार का साथ ही  नहीं मिला, पर वो इशारों में सब कह गयी। ....... उसकी ही कल्पना है, ये कविता -------


उम्र के उस पड़ाव पर जब 
सूखे पत्तों सी झड़ रही थी मैं ,
उसने पूछा कौन हो आप ?
भीतर अंगड़ाइयाँ लेती हसरतों ने ,
झाँका अखियों के झरोखों से ,
मुँह खुला पर लफ्ज़ फिसल गए ,
मैं कौन हूँ बताने को कितनी बेताब ,
 उसने पूछा कौन हो आप ?

मैं नन्ही सी किलकारी बाबुल के अँगना की ,
अम्मा के आँचल और हाथों के कँगना की ,
मैं चंचल सी गुड़िया थी अम्मा की साखी ,
भैया के हाथों पर सजती बन राखी ,
वह बचपन में रोना वो घर और बिछौना ,
आया सब याद..... उसने पूछा -----?????

खिलती कली बनकर महकी फ़िजा में ,
उफ़ ,क्या वादों इरादों के कल थे ,
वो आँखों ही आँखों से होती थी बातें ,
बड़े खूबसूरत जवानी के पल थे ,
वो सात फेरे और जन्मों का बंधन ,
सुर्ख़ लाल जोड़ा सजी एक दुल्हन,
लो फिर याद आयी जवानी की बातें ,
चाँदनी की बारिश में घुलती हुई रातें ,
यह सब बताने को कितनी बेताब --
मुँह खुला -----------------
उसने पूछा कौन ---------???,

कुदरत का करिश्मा मैंने भी  पाया ,
ललना का पलना अँगना में आया,
ऊँचे सपनों भरे आसमां में ,
मैंने ही उसको उड़ना सिखाया,
वो मंजिल तक पहुँचा यह मुझको है नाज़ ,
 जाने क्यों बदला- बदला सा आज ,
समय का फेरा कभी दिन कभी रात ,
आधा ही रह गया जन्मों का साथ ,
आधी अधूरी रह गयी हर बात ,
मैं हूँ अकेली बस यादें है साथ ,
मैं एक लिफाफा बंद उसमें कहानी,
 क्या पढ़ सकोगे सब तो है जुबानी,
ये सब बताने को मैं थी बेताब ,
अच्छा हुआ, जो लफ्ज़ फिसल गए,
 उसने पूछा कौन हो आप?????








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